mai ek naari hu / मै एक नारी हु- poetry
मै एक नारी हूँ प्रेम चाहती हूँ और कुछ नहीं
मै एक नारी हूँ मै सब संभाल लेती हूँ
हर मुस्किल से खुद को उबार लेती हूँ
नहीं मिलता वक्त घर गृहस्थी में
फिर भी अपने लिए वक्त निकाल लेती हूँ
टूटी होती हूँ अंदर से कई बार मै
पर सबकी ख़ुशी के लिए मुस्कुरा देती हूँ
गलत न होके भी ठहराई जाती हूँ गलत
घर की शांति के लिए मै चुप्पी साध लेती हूँ
सच्चाई के लिए लड़ती हूँ सदा मै
अपनो को जिताने के लिए हार मान लेती हूँ
व्यस्त है सब प्यार का इजहार नहीं करते
पर मै फिर भी सबके दिल की बात जान लेती हूँ
कही नजर ना लग जाये मेरी अपनी ही
इसलिए पति बच्चे की नजर उतार लेती हूँ
उठती नहीं जिम्मेदारिय मुझसे कभी-कभी
पर फिर भी बिना उफ किये सब संभाल लेती हूँ
बहुत थक जाती हूँ कभी-कभी
पति के कंधे पर सर रख थकान उतार लेती हूँ
नही सहा जाता जब दर्द और खुशिया
तब अपनी भावनाओ को कागज पर उतार लेती हूँ
कभी-कभी खाली लगता है भीतर कुछ
तब घर के हर कोने में खुद को तलास लेती हूँ
खुश हूँ, कि मै किसी को कुछ दे सकती हूँ
जीवनसाथी के संग-संग चल अपने सपने सवार लेती हूँ
हा मै एक नारी हूँ , मै सब संभाल लेती हूँ
अपनो की खुशियों के लिए अपना सबकुछ वार देती हूँ
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